Home remedy for stone problem


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06 Apr
06Apr

पथरी
मूत्राशमरी:

मूत्राशय में होने वाली अश्मरी यदि मूत्र मार्ग में आकर अटक जाए तो रोगी मा मूत्र बंद हो जाता है और पथरी मूत्रमार्ग से हट जाने पक मूत्र निकलता है। मूत्रत्याग में कष्ट होना, मूत्र विसर्जन के पश्चात लिंगमुण्ड में जलन होना, वृष्ण (अण्डकोष) एंव शिश्न (लिंग) में वेदना आदि लक्षण होते है तथा मूत्र थोड़ा-थोड़ा व बार-बार आता है। मूत्र की टेढ़ी अथवा 2 धार होती हैं। इस अश्मरी से पीड़ित रोगी को मूत्र त्याग में कष्ट, मूत्रत्याग के उपरांत शिश्न के अग्र भाग में जलन होने के अतिरिक्त मूत्र बूंद-बूंद करके कष्ट के साथ उतरता है। मूत्राशय में पीड़ा तथा मूत्राशय फूला रहता है।

वृक्काशमरी:
यह अश्मरी वृक्क या गुर्दे (Kidney) में होती है। यह अश्मरी अपने स्थान से हट जाने पर वृक्क में दर्द उत्पन्न होता है। यह अश्मरी दाएं या बाएं जिस वृक्क में होती है, दर्द के समय उसी और की जंघा से होता हुआ दर्द अण्डकोष तक जाता है। कभी-कभी यह दर्द इतना तेज हो जाता है कि रोगी उससे अत्यधिक व्याकुल हो जाता है तथा अपनी मृत्यु की ईश्वर से प्रार्थना करने लगता है। अश्मरी वृक्क से खिसक-खिसककर मूत्र प्रणाली द्वारा मूत्राशय में आती है। यदि यह अश्मरी मूत्र प्रणाली में अटक जाए तो असहनीय पीड़ा होती है। इस अश्मरी से पीड़ित रोगी की कमर में पथरी वाले पाशर्व की ओर मीठा-मीठा दर्द बना रहता है, मूत्र थोड़ा-थोड़ा आता है तथा कदाचित मूत्र में रक्त भी आता है।

गवीनी अश्मरी:
यह पथरी गवीनी (मूत्रवाहिनी) के मुख पर होती है। गवीनी का मुख ऊपर से चौड़ा तथा नीचे से तंग होता है। जब पथरी आकार में बढ़ जाती है और मूत्रवाहिनी के मुंह पर अटक जाती है तो मूत्र आना रूक जाता है अथवा छोटी पथरी गवीनी के अन्दर जाकर मूत्रवाहिनी के निचले मार्ग में अटक जाए तो मूत्र आना बन्द हो जाता है। मूत्र में अवरोध होना इस अश्मरी का लक्षण है।

पित्ताशमरी:
यह अश्मरी पित्ताशय (पित्त की थैली यानी गाल ब्लेडर) में होती है। पित्ताशय में पथरी की पीड़ा रात्रि में साते समय विशेष रूप से होती है तथा यदा-कदा भारी भोजन करने के उपरांत भी पीड़ा होती है। यह पीड़ा कभी जल्द ही शांत होती है तो कभी देर से समाप्त होती है। यदि पथरी पित्ताशय से निकलकर पित्तवाहिनी नलिका में आकर अटक जाए तो रोगी को असहनीय दर्द होता है। दर्द पित्ताशय से प्रारंभ होकर पीछे पीठ की और अथवा दाहिने कंधे की ओर जाता है तथा संपूर्ण पेट में दर्द प्रतीत होता है। वेदना स्थान पर हाथ लगाने से पीड़ा में वृध्दि होती है। उल्टी (वमन) होने पर कुछ शांति का आभास होता है। दर्द का कोई समय निश्चित नहीं होता है। इस अश्मरी के दर्द का अचानक प्रारंभ होना और अचानक लुप्त हो जाना ही पित्ताशय अश्मरी का विशेष लक्षण है।

विशेष:
लक्षणों के स्थान पर पथरी की जांच एक्स-रे अथवा अल्ट्रासाउंड- सोनोग्राफी से करवानी चाहिए।

नोट :
नाभि स्थान तथा अंडकोष सूजनयुक्त हो, रोगी को लगातार दर्द हो, मूत्र में छोटे-छोटे कण आते हों तथा साथ में रक्त भी आता हो और मूत्र कठिनाई से उतर रहा हो तो ऐसी अवस्था चिंताजनक कहलाती है।

घरेलू बैधक चिकित्सा:
# : प्रतिदिन प्रात: सायं 1 कागजी नीबू का रस जल में मिलाकर सेवन करें।
# : मूली का रस 20 ग्राम नित्य सेवन करें।
: चुकन्दर का रस या चुकन्दर को जल में उबालकर उसका सूप 30 ग्राम की मात्रा में दिन में 3-4 बार सेवन करने से मूत्राशय की पथरी निकल जाती है।
# : मूली के बीज 40 ग्राम को आधा लीटर जल में पकाएं, जब 250 ग्राम जल शेष रस जाए तो छानकर पिएं । प्रयोग लगातार कुछ दिन जारी रखें। पथरी रोग में बहुत ही गुणकारी प्रयोग है।

# : 40 ग्राम मूली के पत्तों के रस में 3 ग्राम अजमोदा मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करते रहना हितकर है।

# : श्वेत पर्पटी और यवक्षार, 250-250 मि. ग्रा. = 1 मात्रा गर्म जल के अनुपात से सेवन करने से मूत्र खुलकर आता है।

# : पुनर्नवारिष्ट 25 मि.ली. समान भाग जल मिलाकर दिन में 2 बार भोजनोपरांत सेवन करें।
# : हजरूल यहूद (बेर पत्थर) भस्म 125 मि.ग्रा., यवक्षार 250 मि.ग्रा. तथा श्वेत पुनर्नवामूल चूर्ण 750 मि. ग्रा. 1 मात्रा सुबह को साथ चाटकर ऊपर से दूध पिएं।

# : चटर-पटर के 8-10 पत्ते चबाएं। कुछ दिनों में पथरी स्वत: निकल जाएगी।

# : कचरी की जड़ 10 ग्राम लेकर जौ कूटकर रात्रि के समय 100 ग्राम जल में भिगोकर सुबह के समय भली प्रकार पीस-छानकर सेवन करने से मात्रा 6 दिन में ही लाभ होता है। यदि सेवन करते समय इसमें 1 या 2 ग्राम तक जवाखार भी मिला दिया जाए तो शीघ्र व अधिक लाभ होता है।

# : करेले के हरे पत्तों का रस 30 ग्राम को 15 ग्राम दही के साथ मिलाकर सेवन करें। ऊपर से 50-60 ग्राम छाछ पी लें। यह प्रयोग 3 दिन तक करे, फिर 4 दिन तक प्रयोग बंद करके 5 दिन तक पुन: प्रयोग जारी रखें। इसी प्रकार 1-1 दिन बढ़ाकर उस समय तक प्रयोग करते रहें, जब तक 1 सप्ताह पर न पहुंच जाए। प्रयोगकाल में मूंग की दाल व चावल की पतली खिचड़ी का भोजन करें।

#: गोक्षरादि गुग्गुल 500 मि.ग्रा. प्रात- सांय जल से लें।
# : यवक्षार 1 ग्राम घृत (घी) के साथ मिलाकर सेवन करने से तथा 5-7 मिनट के बाद शीतल जल या दूध की लस्सी पीने से अश्मरी कण दूर होकर मूत्र ठीक आने लगता है।

# : गाजर में छिद्र करके उसमें गाजर के बीज, शलजम के बीज और मूली के बीज भरकर भूभल में पकाकर सेवन करने से बस्ति (मूत्राशय) व वृक्कगत पथरी निकल जाती है।

# : कागजी नीबू का रस 6 ग्राम, कमली शोरा 4 रत्ती तथा काले तिल (पिसे हुए) 1ग्राम शीतल जल के साथ दिन में 1-2 बार निरंतर 21 दिन सेवन करने से पथरी गल जाती है।

# : प्याज को कतरकर जल से धोकर उसका 20 ग्राम रस निकालकर उसमें 50 ग्राम मिसरी मिलाकर सेवन करने से पथरी टूटकर मूत्रमार्ग द्वारा बाहर निकल जाती है।

# : बकायन के पक्तों के रस में यवक्षार 4 रती मिलाकर कुछ दिन तक सेवन करते रहने से अश्मरी कण निकल जाते हैं।

# : छोटे गोखरू के 3 ग्राम चूर्ण को शहद के साथ चाटकर ऊपर भेड़ या बतरी का दूध पीने से पथरी रोग में लाभ होता है।

# : मुलहठी और कुलत्थी 10-10 ग्राम और सौंफ 30 ग्राम। इन तीनों को आधा लीटर जल में औटाएं। जब जल जौथाई शेष बचे तो जल छानकर उसमें 3 ग्राम लाहौरी नमक और 2 ग्राम घी मिलाकर सेवन करने से पथरी गलकर बाहर निकल जाती है।

# : पाषाण भेद 100 ग्राम और पत्थर बेर 10 ग्राम इन दोनों को मिलाकर बारीक चूर्ण बनाकर 3-3 ग्राम की मात्रा में प्रात: सायं जल से सेवन करने से बहुत जल्द पथरी गल-गलकर मूत्र मार्ग द्वारा बाहर निकल जाती है।

# : केले की डाल के रस अथवा नारियल के 3-4 औंस जल में 1-1 ग्राम शोरा मिलाकर दिन में 2 बार सेवन कराते रहने से पथरी कण निकल जाते हैं तथा मूत्र खुलकर व साफ आता है।

होम्योपैथिक (Homeopathic)
बायोकैमिक चिकित्सा :


कैल्केरियाफाॅस 6x : पित्ताशय की पथरी में प्रयोग करें। हितकर है।

नैट्रमम्यूर 6x : मूत्र कष्ट के साथ उतरने की स्थिति में प्रयोग करें।

नैट्रम सल्फ 30x : यदि वृक्क प्राकृत रूप से कार्य न करें तथा पथरी मालूम पड़े तो इन लक्षणों में रोगी को सेवन कराएं।

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